दीपावली विशेष: मां महालक्ष्मी की आराधना, सुख-समृद्धि की कामना और गरीबों की दिवाली का सवाल; सुरक्षित और प्रदूषण मुक्त त्योहार मनाने का लें संकल्प,,
कोरबा कटघोरा——- दीपावली का पर्व केवल दीप जलाने और धन-संपत्ति की पूजा करने का अवसर नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश, निराशा से आशा और अभाव से खुशहाली की ओर बढ़ने का संदेश भी देता है। भारतीय संस्कृति में दीपावली का विशेष धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह पर्व मां महालक्ष्मी के स्वागत, भगवान गणेश की आराधना और परिवार में सुख-शांति एवं समृद्धि की कामना के साथ मनाया जाता है। घर-आंगन में दीपों की रोशनी, रंगोली की सजावट, मिठाइयों की खुशबू और अपनों के साथ खुशियां बांटने की परंपरा इस त्योहार को विशेष बनाती है।
महालक्ष्मी पूजन का धार्मिक महत्व और विधि
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दीपावली की अमावस्या की रात्रि मां महालक्ष्मी की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की आराधना करने से घर में सुख, शांति, धन-धान्य और समृद्धि का आगमन होता है।
पूजन के लिए सबसे पहले घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई कर उसे फूलों, रंगोली और दीपों से सजाया जाता है। शुभ मुहूर्त में चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके बाद भगवान गणेश का स्मरण कर पूजा प्रारंभ की जाती है।
मां लक्ष्मी को अक्षत, पुष्प, रोली, चंदन, धूप, दीप, फल, मिठाई और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की आरती की जाती है। परिवार के सभी सदस्य सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और मंगलमय जीवन की कामना करते हैं। घर के मुख्य द्वार और आंगन में दीपक जलाकर खुशियों और सकारात्मकता का संदेश दिया जाता है।
क्या दीपावली केवल धनवानों का त्योहार बनकर रह गई है?
दीपावली को अक्सर धन और वैभव का त्योहार कहा जाता है। बाजारों में रौनक रहती है, बड़े-बड़े प्रतिष्ठानों में आकर्षक सजावट होती है, महंगे उपहार खरीदे जाते हैं और आतिशबाजी पर हजारों रुपये खर्च किए जाते हैं। लेकिन इस चमक-दमक के बीच समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिसके लिए दीपावली की खुशियां आर्थिक मजबूरियों के सामने छोटी पड़ जाती हैं।
एक तरफ संपन्न परिवार लाखों रुपये की खरीदारी करते हैं, वहीं दूसरी तरफ गरीब परिवार इस चिंता में रहता है कि त्योहार पर बच्चों के लिए नए कपड़े खरीदे या घर के राशन की व्यवस्था करे। किसी के घर में मिठाइयों की कई किस्में सजती हैं तो किसी के घर में साधारण पकवान बनाना भी मुश्किल होता है। किसी के आंगन में सैकड़ों दीप जलते हैं तो कोई परिवार तेल और बाती के अभाव में एक छोटा-सा दीपक जलाकर त्योहार मनाता है।
सवाल यह है कि क्या दीपावली मनाने का अधिकार केवल आर्थिक रूप से संपन्न लोगों तक सीमित है? क्या खुशियां खरीदने के लिए धनवान होना जरूरी है?
निश्चित रूप से ऐसा नहीं होना चाहिए। दीपावली किसी वर्ग विशेष का नहीं, बल्कि पूरे समाज का त्योहार है। इसकी असली खूबसूरती महंगे उपहारों और दिखावे में नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, अपनत्व और खुशियां बांटने में छिपी है।
गरीब की दिवाली कैसे रोशन हो?
दीपावली की सार्थकता तभी है, जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी इस पर्व की खुशियों में शामिल हो सके। संपन्न परिवार यदि अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद परिवारों की मदद करें तो कई गरीब घरों में भी दीपावली का उजाला पहुंच सकता है।
किसी जरूरतमंद बच्चे को नए कपड़े देना, गरीब परिवार को मिठाई और राशन उपलब्ध कराना, बुजुर्गों को सहयोग देना, मजदूरों और जरूरतमंदों के घर दीपक पहुंचाना जैसे छोटे-छोटे प्रयास किसी के जीवन में बड़ी खुशी ला सकते हैं।
मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों से दीप खरीदना, स्थानीय छोटे दुकानदारों और कारीगरों को प्रोत्साहित करना भी इस त्योहार को सामाजिक रूप से सार्थक बनाता है। इससे उन परिवारों के घरों में भी खुशियों का दीप जलता है, जो अपने श्रम से दूसरों के त्योहार को रोशन करते हैं।
पटाखों और आतिशबाजी से सावधान रहें, खुशियों का त्योहार हादसों में न बदले
दीपावली की रात रोशनी और उत्साह के बीच पटाखों एवं आतिशबाजी का चलन भी देखने को मिलता है। लेकिन हर साल दीपावली के बाद समाचार पत्रों में पटाखों से झुलसने, आंखों में चोट लगने, आगजनी और अन्य दुर्घटनाओं की अनेक खबरें सामने आती हैं। कहीं किसी बच्चे का हाथ घायल हो जाता है, तो कहीं लापरवाही के कारण घरों, दुकानों और वाहनों में आग लगने की घटनाएं हो जाती हैं।
यह बेहद चिंताजनक है कि जिस त्योहार को परिवार के साथ खुशियां मनाने के लिए मनाया जाता है, वही कभी-कभी किसी परिवार के लिए जिंदगी भर का दर्द बन जाता है। पटाखों की तेज आवाज से छोटे बच्चों, बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और पशु-पक्षियों को भी परेशानी होती है।
हमें समझना होगा कि कुछ क्षणों की आतिशबाजी के लिए किसी की सुरक्षा और स्वास्थ्य को खतरे में डालना उचित नहीं है।
दीपावली पर सुरक्षा के लिए इन सावधानियों का रखें ध्यान:
- बच्चों को अकेले पटाखे न जलाने दें। हमेशा बड़ों की निगरानी में ही आतिशबाजी करें।
- पटाखे खुले और सुरक्षित स्थान पर ही जलाएं। घर, दुकान, गैस सिलेंडर, बिजली के तारों और ज्वलनशील वस्तुओं से दूर रहें।
- ढीले, सिंथेटिक और आसानी से आग पकड़ने वाले कपड़े पहनकर पटाखे न जलाएं।
- पटाखे जलाते समय सुरक्षित दूरी बनाए रखें और पास में पानी या रेत की बाल्टी रखें।
- पटाखा नहीं जलने पर उसके पास जाकर दोबारा आग लगाने या उसे हाथ से उठाने की गलती न करें।
- जलते हुए पटाखों को हाथ में पकड़कर न जलाएं और न ही किसी व्यक्ति की ओर फेंकें।
- आंखों या शरीर पर चोट लगने अथवा जलने की स्थिति में तुरंत उचित प्राथमिक उपचार और चिकित्सकीय सहायता लें।
प्रदूषण मुक्त दीपावली: पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी
पटाखों से निकलने वाला धुआं वातावरण में हानिकारक कणों और गैसों की मात्रा बढ़ाता है। इससे हवा की गुणवत्ता प्रभावित होती है और सांस संबंधी परेशानियों से जूझ रहे लोगों को अधिक कठिनाई हो सकती है। तेज ध्वनि भी ध्वनि प्रदूषण को बढ़ाती है।
दीपावली के बाद सड़कों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर पटाखों का कचरा भी बिखरा दिखाई देता है। इससे स्वच्छता और पर्यावरण दोनों प्रभावित होते हैं।
इसलिए समय की मांग है कि हम पटाखों पर अनावश्यक खर्च करने के बजाय मिट्टी के दीपक, सजावटी रोशनी और पारंपरिक तरीकों से त्योहार मनाएं। यदि आतिशबाजी की जाए तो स्थानीय प्रशासन के दिशा-निर्देशों और निर्धारित समय का पालन करें तथा कम धुआं और कम शोर वाले विकल्पों को प्राथमिकता दें।
आइए, पूरे देश में सुरक्षित, स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त दीपावली मनाने की नई परंपरा की शुरुआत करें। हमारी खुशी किसी दूसरे के लिए परेशानी या खतरे का कारण नहीं बननी चाहिए।
दिखावे और फिजूलखर्ची से दूर, खुशियां बांटने का पर्व बने दीपावली
आज के दौर में दीपावली पर अनावश्यक प्रतिस्पर्धा और दिखावे की प्रवृत्ति भी बढ़ती दिखाई देती है। कौन कितना महंगा सामान खरीदता है, किसके घर की सजावट सबसे आकर्षक है और कौन कितनी आतिशबाजी करता है, इस होड़ में त्योहार का मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाता है।
हमें यह समझना होगा कि त्योहार की सुंदरता खर्च की गई रकम से नहीं, बल्कि मन में मौजूद प्रेम और सद्भाव से बढ़ती है। जरूरतमंदों की सहायता, स्वदेशी वस्तुओं को प्रोत्साहन, मिट्टी के दीपकों का उपयोग और पर्यावरण की रक्षा जैसे कार्य दीपावली के वास्तविक संदेश को मजबूत बनाते हैं।
असली दीपावली तब होगी, जब हर चेहरे पर मुस्कान होगी
मां महालक्ष्मी की पूजा करते समय हमें यह भी संकल्प लेना चाहिए कि हमारे आसपास कोई व्यक्ति भूखा न सोए, कोई बच्चा अभाव के कारण त्योहार की खुशियों से वंचित न रहे और कोई बुजुर्ग अकेलेपन में दीपावली न बिताए।
धन का वास्तविक महत्व तभी है, जब उसका उपयोग स्वयं के साथ-साथ दूसरों के जीवन में भी खुशियां लाने के लिए किया जाए। मां लक्ष्मी की आराधना केवल धन प्राप्ति की कामना तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें दया, करुणा, ईमानदारी, परोपकार और सद्भाव जैसे गुणों का भी समावेश होना चाहिए।
आइए, इस दीपावली पांच संकल्प लें— गरीब के घर में खुशियां पहुंचाएंगे, जरूरतमंदों की मदद करेंगे, पटाखों से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकेंगे, प्रदूषण से पर्यावरण की रक्षा करेंगे और आपसी प्रेम एवं भाईचारे को बढ़ावा देंगे।
क्योंकि सच्ची दीपावली वही है, जहां अमीर के घर की रोशनी के साथ गरीब के चेहरे पर भी मुस्कान दिखाई दे, जहां बच्चों की हंसी सुनाई दे और जहां किसी परिवार को हादसे का दर्द न सहना पड़े।
आप सभी देशवासियों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं। मां महालक्ष्मी और भगवान गणेश आप सभी के जीवन में सुख, शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करें। दीपावली मनाएं, खुशियां बांटें और सुरक्षित रहें।













