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    Home » छत्तीसगढ़ में कलचुरी राजवंश का इतिहास भारत के इतिहास में भी कलचुरी राजवंश का महत्वपूर्ण स्थान है।
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    छत्तीसगढ़ में कलचुरी राजवंश का इतिहास भारत के इतिहास में भी कलचुरी राजवंश का महत्वपूर्ण स्थान है।

    विनोद जायसवालBy विनोद जायसवाल30/12/2025
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    • भारत के इतिहास में भी कलचुरी राजवंश का महत्वपूर्ण स्थान है।

    • भारत के इतिहास में भी कलचुरी राजवंश का महत्वपूर्ण स्थान है।
    • सन् 550 ई. से लेकर 1741 तक लगभग 1200 वर्षों की अवधि में कलचुरी नरेश भारत के किसी-न-किसी प्रदेश पर राज्य करते रहे।
    • 1000 में छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश की स्थापना हुई।
    • 1000 मे कोकल्लदेव द्वितीय के 18 पुत्रों में से एक छोटे पुत्र कलिंगराज ने कोसल पर विजय प्राप्त कर तुम्मान को अपनी राजधानी बनाया।
    • छत्तीसगढ़ कलचुरी का शासन तुम्मान से प्रारंभ होता है।
    • छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक समय तक शासन किया।
    • डॉ. मिराशी के अनुसार कलचुरी नरेश अपने को सहस्त्रर्जुन कहे जाने में गौरव का अनुभव करते थे। प्राचीन समय में कलचुरीयों को ‘कटच्चुरि’, प्रतिद्वंदी चालुक्यों द्वारा ‘कलत्सूरि’ तथा शिलालेख में ‘कलचुरी’ या ‘कालाचरि’ कहा गया है।
    • इस वंश की स्थापना को ही मध्यकालीन छत्तीसगढ़ का इतिहास का माना जाता है।
    • कलचुरी और हैहयवंशी एक ही थे। विद्वानों ने इन्हें चंद्रवंशी क्षत्रिय माना है।
    • ताम्रपत्र लेख का आरंभ ‘ऊ नमः शिवाय’ से होता था।
    • कालंजर, प्रयाग त्रिपुरी, काशी, तुम्माण, रतनपुर खल्लारी, रायपुर में कलचुरी  नरेशों ने अपनी राजधानी स्थापित की।
    • रतनपुर में शासन करने वाले कलचुरी का मूल स्थान माहिष्मती था।
    • राजा माहिष्मान ने नर्मदा नदी के किनारे माहिष्मति नगर बसाया था। उस समय माहिष्मती हैहयवंशियों की राजधानी थी, जो बाद में त्रिपुरी कहलाया ।
    • कलचुरीवंश का मूल पुरुष कृष्णराज था, जिसने इस वंश की स्थापना की और 500 से 575 ई. तक राज्य किया।
    • कोकल्ल प्रथम के 18 पुत्रों में सबसे बड़ा पुत्र शंकरगढ़ द्वित्तीय (मुग्धतुंग) था, जो 900-950 में त्रिपुरी की गद्दी पर बैठा।
    • बिलहरी ताम्रपत्र के अनुसार, मुग्धतुंग ने लगभग 900ई में कोसल के सोमवंशी राजाओं को पराजित कर उससे पाली क्षेत्र (कोरबा) को जीतकर अधिकार कर लिया था।
    • मुग्धतुंग ने इस क्षेत्र में स्वयं शासन नहीं किया, बल्कि अपने छोटे भाई को अधिपति बनाकर इस क्षेत्र का शासक नियुक्त किया। उसके भाई ने तुम्माण को राजधानी बनाकर शासन किया।
    • 950 के लगभग स्वर्णपुर (सोनपुर, उड़ीसा) के सोमवंशी राजा ने कलचुरियों की इस शाखा को तुम्माण से मार भगाया।
    • छत्तीसगढ़ कलचुरी का शासन तुम्माण से प्रारंभ होता है।
    1. कलिंगराज (1000 से 1020 ई.)
    2. कमलराज (1020 से 1045 ई.)
    3. रत्नदेव प्रथम (1045 से 1065 ई.)
    4. पृथ्वीदेव प्रथम (1065 से 1095 ई.)
    5. जाजल्यदेव प्रथम (1095 से 1120 ई.)
    6. रत्नदेव द्वितीय (1120 से 1135 ई.)
    7. पृथ्वीदेव द्वितीय (1135 से 1165 ई.)
    8. जाजल्यदेव द्वितीय (1165 से 1168 ई.)
    9. जगतदेव (1168 से 1178 ई.)
    10. रत्नदेव तृतीय (1178 से 1198 ई.)
    11. प्रतापमल्ल (1198 से 1222 ई.)
    12. बाहरेन्द्रसाय (1480 से 1525 ई.)
    13. कल्याणसाय (1544 से 1581 ई.)
    14. लक्ष्मणसाय (1000 से 1020 ई.)
    15. तख्तसिंह
    16. राजसिंह (1689 से 1712 ई.)
    17. सरदार सिंह (1712 से 1732 ई.)
    18. रघुनाथ सिंह (1732 से 1745 ई.)
    19. मोहन सिंह (1745 से 1757 ई.)

    रायपुर शाखा के कलचुरी शासक

    1. लक्ष्मीदेव – 1300 ई. से 1340 तक (प्रथम शासक (राजधानी- खल्लवाटिका)
    2. सिंघनदेव -1340 ई. से 1380 तक (18 गढ़ो के विजेता)
    3. रामचंद्र देव – 1380 ई. से 1400 तक (रायपुर नगर के संस्थापक)
    4. हरिब्रम्ह देव – 1400 ई. से 1420 तक (रायपुर को राजधानी बनाया )
    5. केशव देव – 1420 ई. से 1438 तक (रायपुर शाखा के संस्थापक)
    6. भुनेश्वर देव – 1438 ई. से 1463 तक (रायपुर किले का निर्माण करवाया )
    7. मानसिंह देव – 1463 ई. से 1478 तक
    8. संतोष सिंह देव – 1478 ई. से 1498 तक
    9. सूरत सिंह देव – 1498 ई. से 1518 तक
    10. सैनसिंह देव – 1518 ई. से 1528 तक
    11. चामुण्डासिंह देव – 1528 ई. से 1563 तक
    12. वंशीसिंह देव – 1563 ई. से 1582 तक
    13. धनसिंह देव – 1582 ई. से 1604 तक
    14. जैतसिंह देव – 1604 ई. से 1615 तक
    15. फत्तेसिंह देव – 1615 ई. से 1636 तक
    16. यादसिंह देव -1636 ई. से 1650 तक
    17. सोमदत्त देव -1650 ई. से 1663 तक
    18. बलदेवसिंग देव -1663 ई. से 1685 तक
    19. उमेंद सिंह देव -1685 ई. से 1705 तक
    20. बनवीरसिंह देव -1705 ई. से 1741 तक
    21. अमर सिंह देव -1741 ई. से 1753 तक (अंतिम कलचुरी शासक)
    22. शिवराज सिंह – 1753 ई. से 1757 तक (मराठा अधीन
    23. शासन )

     

    1. 18वीं शताब्दी के समय कलचुरि वंश के शासकों की शासन करने की कमजोर नीति तथा मोहन सिंह के षड्यन्त्र छत्तीसगढ़ में कलचुरियों के पतन के प्रमुख कारण बनें।
    2. भोंसला सेनापति भास्कर पन्त का 1741 ई. में रतनपुर में आक्रमण करना तथा तत्कालीन शासक रघुनाथ सिंह का आत्मसमर्पण कलचुरि सत्ता के पतन का प्रमुख कारण है।
    3. 1750 ई. में मराठों ने अमरसिंह को हराकर रायपुर, राजिम व पाटन की जमींदारी ले ली। अमरसिंह की मृत्यु के पश्चात् उसके बेटे शिवराज सिंह से जागीर छीन ली गई।
    4. 1757 ई. में जब मराठों का प्रत्यक्ष शासन आरम्भ हुआ, तब शिवराज सिंह को महासमुन्द के पास बड़गाँव एवं 4 अन्य गाँव दे दिए गए तथा रायपुर के प्रत्येक गाँव से 1-1 रुपये की वसूली का अधिकार भी दिया गया।
    5. इस प्रकार अमर सिंह के बेटे शिवराज सिंह से 1822 ई. में मराठों ने
    कलचुरी शासक स्थान शताब्दी स्तापत्य
    रत्नदेव प्रथम रतनपुर 11वीं सदी महामाया मंदिर
    लाफागढ़ 11वीं सदी महिसासुरमर्दनी मंदिर
    रत्नदेव तृतीय रतनपुर 12 वीं सदी एकवीरा मंदिर
    पृथ्वी प्रथम तुम्माण 11वीं सदी पृथ्वीदेवेश्वर मंदिर
    रतनपुर 11वीं सदी रतनपुर का विशाल तालाब
    पृथ्वीदेव द्वितीय रतनपुर 12 वीं सदी गजकीला
    रतनपुर 12 वीं सदी खडग तालाब
    जाजल्यदेव जांजगीर 12 वीं सदी विष्णु मंदिर
    जाजल्यदेव द्वितीय शिवरीनारायण 12 वीं सदी चंद्रचूड़ मंदिर
    बाहरेन्द्र साय चैतुरगढ़ 15 वीं सदी चैतुरगढ़ का किला
    कोसगई 15 वीं सदी कोसगई मंदिर
    तख़्त सिंह तख्तपुर 17 वीं सदी शिव मंदिर
    राजसिंह रतनपुर 17 वीं सदी बादलमहल
    ब्रम्हदेव साय खल्लारी 15 वीं सदी विष्णु मंदिर (देवपाल )
    जैतसिंह देव रायपुर 15 वीं सदी दूधाधारी मठ (बलभद्र दास )

     

     

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