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    कोरबा: SECL कुसमुंडा क्षेत्र में भू-विस्थापित महिलाओं का अर्धनग्न प्रदर्शन, ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति ने राष्ट्रीय और राज्य महिला आयोग से मांगा न्याय,,

    विनोद जायसवालBy विनोद जायसवाल23/07/2025
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    कोरबा: SECL कुसमुंडा क्षेत्र में भू-विस्थापित महिलाओं का अर्धनग्न प्रदर्शन, ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति ने राष्ट्रीय और राज्य महिला आयोग से मांगा न्याय,,

    कोरबा, छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के कुसमुंडा क्षेत्र में साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के खिलाफ भू-विस्थापित परिवारों, विशेष रूप से महिलाओं, का लंबे समय से चल रहा आंदोलन हाल ही में तब सुर्खियों में आया, जब 18 जुलाई 2025 को 20-25 महिलाओं ने रोजगार और पुनर्वास की मांग को लेकर SECL के कुसमुंडा कार्यालय के मुख्य द्वार पर अर्धनग्न प्रदर्शन किया। इस घटना ने न केवल स्थानीय प्रशासन, बल्कि पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति के अध्यक्ष सपुरन कुलदीप ने इस गंभीर और संवेदनशील मामले को राष्ट्रीय और राज्य महिला आयोग के समक्ष उठाते हुए पत्र लिखकर त्वरित कार्यवाही और भू-विस्थापितों को न्याय दिलाने की मांग की है। यह घटना छत्तीसगढ़ में औद्योगीकरण और खनन परियोजनाओं के कारण विस्थापित समुदायों की उपेक्षा और उनके अधिकारों के हनन की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है।
    घटना का विवरण: अर्धनग्न प्रदर्शन और आंदोलन
    18 जुलाई 2025 को कोरबा जिले के कुसमुंडा क्षेत्र में SECL की कोयला खदान से प्रभावित लगभग 150 भू-विस्थापित परिवारों की महिलाओं ने अपनी पुश्तैनी जमीन के बदले रोजगार और उचित पुनर्वास की मांग को लेकर SECL कार्यालय के मुख्य द्वार पर धरना दिया। अपनी मांगों को अनसुना किए जाने और वर्षों की उपेक्षा से त्रस्त होकर, इन महिलाओं ने मजबूरी में अर्धनग्न प्रदर्शन का कठोर कदम उठाया। यह प्रदर्शन छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक अभूतपूर्व और दुखद घटना के रूप में दर्ज हो गया है, जो भू-विस्थापित समुदायों की पीड़ा और प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है।
    महिलाओं का कहना है कि उनकी पुश्तैनी जमीन को SECL द्वारा कोयला खनन के लिए अधिग्रहित किया गया, लेकिन बदले में न तो उन्हें वादा किया गया रोजगार मिला, न ही उचित मुआवजा और पुनर्वास की व्यवस्था की गई। इससे पहले भी इन परिवारों ने कई बार आंदोलन किए, जिनमें उन्हें जेल तक जाना पड़ा, लेकिन उनकी मांगें अनसुनी रही। इस बार, अपनी आवाज को बुलंद करने के लिए महिलाओं को अर्धनग्न प्रदर्शन जैसा चरम कदम उठाना पड़ा, जो सामाजिक और प्रशासनिक विफलता का प्रतीक है।
    ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति का पत्र
    ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति के अध्यक्ष सपुरन कुलदीप ने इस घटना को “गंभीर और चिंतनीय” बताते हुए राष्ट्रीय और राज्य महिला आयोग को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। पत्र में उन्होंने कहा कि कोरबा जिले में 1960 के दशक से औद्योगीकरण और कोयला खनन की शुरुआत के साथ ही बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण हुआ, जिसके कारण स्थानीय समुदायों को अपनी कृषि भूमि, निवास गांवों, और वन भूमि से विस्थापित होना पड़ा। इस प्रक्रिया में उनके पारंपरिक अधिकारों और आजीविका के साधनों का हनन हुआ, लेकिन आज तक उन्हें पूर्ण और विधिवत पुनर्वास नहीं मिला।
    कुलदीप ने पत्र में विशेष रूप से उल्लेख किया कि SECL कुसमुंडा क्षेत्र में 1983 में जटराज, जरहाजेल, दुरपा, खम्हरिया, बरपाली, गेवरा, बरमपुर, पाली, और मनगांव जैसे गांवों की जमीन का अधिग्रहण किया गया था। तत्कालीन जिला प्रशासन द्वारा पारित अवार्ड में यह शर्त थी कि 20 से 60 वर्षों में खनन कार्य पूरा होने के बाद जमीन मूल मालिकों को वापस की जाएगी और बुनियादी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। इसके अलावा, प्रत्येक प्रभावित परिवार के एक सदस्य को रोजगार देने का वादा भी किया गया था। हालांकि, SECL ने न तो जमीन वापस की और न ही रोजगार के वादे को पूरा किया।
    रोजगार में धांधली और प्रशासनिक विफलता
    सपुरन कुलदीप ने अपने पत्र में गंभीर आरोप लगाए कि SECL और राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से रोजगार देने की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर धांधली हुई। प्रभावित परिवारों के सदस्यों के बजाय, फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अन्य लोगों को नौकरियां दे दी गईं। इस धांधली के कारण कई परिवार आजीविका के अभाव में दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हैं। लंबे समय तक आवेदन और शिकायतों के बाद भी कोई सुनवाई न होने पर, भू-विस्थापित परिवारों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा। कुलदीप ने कहा कि महिलाओं का अर्धनग्न प्रदर्शन उनकी विवशता और प्रशासन की संवेदनहीनता का परिणाम है।
    महिला आयोग से न्याय की मांग
    ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति ने राष्ट्रीय और राज्य महिला आयोग से इस मामले को संज्ञान में लेने और त्वरित कार्रवाई करने की मांग की है। पत्र में मांग की गई है कि:
    रोजगार और मुआवजा: भू-विस्थापित परिवारों को तत्काल रोजगार और उचित मुआवजा प्रदान किया जाए।
    पुनर्वास: प्रभावित परिवारों के लिए विधिवत पुनर्वास की व्यवस्था की जाए, जिसमें आवास, बुनियादी सुविधाएं, और आजीविका के साधन शामिल हों।
    जांच और कार्रवाई: रोजगार में हुई धांधली और SECL की वादाखिलाफी की उच्च स्तरीय जांच हो, और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
    महिलाओं के सम्मान की रक्षा: प्रदर्शनकारी महिलाओं के साथ हुए दुर्व्यवहार और उनकी मजबूरी को ध्यान में रखते हुए, उनके सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
    कुलदीप ने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि एक “संवेदनशील सरकार” के दावों के बावजूद, महिलाओं को अपनी बात रखने के लिए इस तरह के चरम कदम उठाने पड़ रहे हैं, जो न केवल शर्मनाक है, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
    औद्योगीकरण और भू-विस्थापन की पृष्ठभूमि
    कोरबा जिला, जिसे “ऊर्जाधानी” के रूप में जाना जाता है, कोयला खनन, बिजली उत्पादन, और औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है। 1960 के दशक से शुरू हुए औद्योगीकरण ने इस क्षेत्र को देश की ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया, लेकिन इसके साथ ही स्थानीय समुदायों को भारी कीमत चुकानी पड़ी। बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण के कारण हजारों परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन, घर, और आजीविका से वंचित हो गए। कोयला खनन और पावर प्लांट परियोजनाओं के विस्तार, नई रेल लाइनों के निर्माण, और खनिज परिवहन ने स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण समुदायों को विस्थापित कर दिया, जिनके पारंपरिक अधिकारों और वन भूमि पर निर्भरता को नजरअंदाज किया गया।
    SECL कुसमुंडा क्षेत्र में 1983 से शुरू हुए खनन कार्यों ने जटराज, जरहाजेल, दुरपा, खम्हरिया, बरपाली, गेवरा, बरमपुर, पाली, और मनगांव जैसे गांवों को प्रभावित किया। इन गांवों के निवासियों को वादा किया गया था कि उनकी जमीन का उपयोग खनन के बाद उन्हें वापस किया जाएगा और प्रत्येक परिवार को रोजगार और बुनियादी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। हालांकि, 40 वर्षों बाद भी ये वादे पूरे नहीं हुए, जिसके कारण प्रभावित परिवार आज भी संघर्षरत हैं।
    सामाजिक और प्रशासनिक संदर्भ
    यह घटना कोरबा और छत्तीसगढ़ में हाल की अन्य त्रासदियों, जैसे रायगढ़ में हाथी हमले और कोरबा में महिला पंचायत सचिव की रहस्यमयी मौत, के साथ मिलकर सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियों को उजागर करती है। जहां एक ओर कलेक्टर अजीत वसंत ने डीएमएफ कार्यों और सामाजिक योजनाओं को गति देने के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं, वहीं भू-विस्थापितों की अनसुनी मांगें और महिलाओं का अर्धनग्न प्रदर्शन प्रशासन की संवेदनहीनता और नीतिगत खामियों को दर्शाता है।
    सामाजिक दृष्टिकोण से, यह घटना महिलाओं के सम्मान और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए समाज और सरकार की जिम्मेदारी पर सवाल उठाती है। सोशल मीडिया पर इस घटना की व्यापक निंदा हुई है, जिसमें कई लोगों ने इसे छत्तीसगढ़ के इतिहास में एक शर्मनाक और दुखद अध्याय बताया है।
                       ,,निष्कर्ष,,

    SECL कुसमुंडा क्षेत्र में भू-विस्थापित महिलाओं का अर्धनग्न प्रदर्शन और ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति का महिला आयोग को पत्र न केवल एक स्थानीय मुद्दे को उजागर करता है, बल्कि यह औद्योगीकरण के नाम पर आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के शोषण की गहरी समस्या को सामने लाता है। यह घटना सरकार, SECL, और समाज से यह सवाल पूछती है कि आखिर कब तक विस्थापित समुदाय अपनी जमीन, सम्मान, और आजीविका के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।
    राष्ट्रीय और राज्य महिला आयोग से इस मामले में त्वरित हस्तक्षेप और जांच की उम्मीद की जा रही है, ताकि भू-विस्थापित परिवारों को उनका हक मिले और ऐसी शर्मनाक घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। यह घटना न केवल प्रशासनिक सुधारों की मांग करती है, बल्कि समाज को यह सोचने पर भी मजबूर करती है कि विकास की कीमत क्या वाकई में गरीब और वंचित समुदायों को अपनी जमीन, सम्मान, और आजीविका गंवाकर चुकानी चाहिए।

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    विनोद जायसवाल

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