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    छत्तीसगढ़ सहित देशभर में रक्षाबंधन की धूम: अटूट प्रेम और विश्वास के साथ मनाया गया भाई-बहन का पावन पर्व,,

    विनोद जायसवालBy विनोद जायसवाल28/08/2026
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    छत्तीसगढ़ सहित देशभर में रक्षाबंधन की धूम: अटूट प्रेम और विश्वास के साथ मनाया गया भाई-बहन का पावन पर्व,,

    कोरबा कटघोर——भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल खुशियों के उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, पारिवारिक जुड़ाव और आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक हैं। इसी महान परंपरा को संजोए हुए भाई-बहन के प्रेम और विश्वास का पर्व रक्षाबंधन छत्तीसगढ़ सहित पूरे भारत में अपार उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया।

    ​सावन मास की पूर्णिमा के पावन अवसर पर बहनों ने पारंपरिक विधान से अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाया, कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और मिठाई खिलाकर उनके आरोग्य, सुख और लंबी उम्र की प्रार्थना की। वहीं, भाइयों ने भी अपनी बहनों को विशेष उपहार भेंट करते हुए जीवनभर उनके सम्मान, सुरक्षा और सुख-दुख में साथ निभाने का संकल्प दोहराया।

    ​राखी केवल कलाई पर ही क्यों बांधी जाती है?

    ​वैदिक और आयुर्वेदिक मान्यताओं के अनुसार, हमारी कलाई पर शरीर की प्रमुख नसें और नाड़ियां (त्रिदोष—वात, पित्त, कफ को नियंत्रित करने वाले बिंदु) स्थित होती हैं। कलाई पर सूती या रेशमी धागा बांधने से शरीर में ऊर्जा का प्रवाह संतुलित रहता है और स्वास्थ्य को बल मिलता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से कलाई पर रक्षा सूत्र बांधना व्यक्ति को उसके कर्तव्यों और संकल्पों से जोड़े रखने का प्रतीक माना जाता है।

    ​वर्ष में एक बार ही क्यों आता है यह पर्व?

    ​भारतीय काल-गणना के अनुसार, श्रावण पूर्णिमा का दिन ऋतु परिवर्तन, प्राकृतिक ताजगी और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए बेहद पवित्र माना गया है। पुराने समय में इस दिन ऋषि-मुनि अपने शिष्यों और समाज को रक्षा सूत्र बांधकर धर्म और ज्ञान की रक्षा का संकल्प दिलाते थे। वर्ष में एक बार आने वाला यह नियम हमें जीवन की आपाधापी के बीच अपने मौलिक संबंधों, पारिवारिक उत्तरदायित्वों और मानवीय मूल्यों को पुनः तरोताजा करने का अवसर देता है।

    ​राखी बांधने का वास्तविक अर्थ और प्रासंगिकता

    ​रक्षाबंधन केवल एक औपचारिकता या उपहारों के लेन-देन का त्योहार नहीं है। ‘रक्षा सूत्र’ का वास्तविक अर्थ परस्पर संरक्षण, सम्मान और आत्मिक सहयोग है। यह पर्व याद दिलाता है कि भाई और बहन का रिश्ता केवल एकतरफा सुरक्षा का नहीं, बल्कि जीवनभर एक-दूसरे के प्रति निष्ठा, स्नेह और संबल बने रहने का पवित्र बंधन है। आज के आधुनिक दौर में यह त्योहार हमारे सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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    विनोद जायसवाल

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